चित्रकला संयोजन के सिद्धांत
संयोजन का अर्थ
संयोजन किसी भी दो या दो से अधिक
वस्तुओं या तत्वों की वो उचित व सुन्दर प्रयोग है जो देखने में बहुत ही मोहक व
आकर्षक लगे | इसमें प्रयोग किए गए तत्वों
में से किसी एक की प्रधानता हो |
“चित्रकला में
संयोजन का अर्थ वास्तव में कला तत्वों के उस संगठित व उचित उपयोग से है जिसके
परिणाम स्वरुप एक सुंदर चित्र का सर्जन किया जा सके |” सरल शब्दों में कहें तो कला
तत्वों का चित्र में सुंदर व उचित उपयोग ही संयोजन कहलाता है |
वेसे तो संयोजन कैसे किया जा सके
इसकी कोई विधि नही है | संयोजन में चित्रकार के अनुभव, अभ्यास व विवेक का ही असली
काम है | फिर भी अच्छे संयोजन में कुछ बातों का होना आवश्यक है जिनसे चित्र सुंदर
व आकर्षक लगे | इन्ही आवश्यक बातों को हम चित्रकला संयोजन के सिद्धांत कह सकतें हैं |
चित्रकला संयोजन के सिद्धांत
कुछ विद्वानों व लेखकों ने चित्रकला के सिद्धांत 8 बताएं
हैं तो कुछ ने इन्हें 7 बताया | अधिकतर लोगों ने निम्न 7 सिद्धांतों को ही महत्व
दिया है : प्रमाण (Proportion)
- संतुलन (Balance)
- विरोध (Contrast)
- प्रभावित (Dominance/Emphasis)
- सामंजस्य (Harmonny)
- प्रवाह/लय (Rhythm/Pattern/Movement)
- सहयोग/एकता (Unity)
कुछ
विद्वान प्रमाणन को अनुपात भी कहते हैं मगर दोनों एक ही चीज़ हैं | प्रमाणन या
अनुपात का सिद्धांत आकृतियों के आपसी सम्बन्ध व उनकी लम्बाई चौड़ाई के अनुपात या
नाप से है | रंग व तान के उचित व आकर्षक अनुपात के प्रयोग का सम्बन्ध भी प्रमाणन
या अनुपात से है |
इसको
“संबद्धता का सिद्धांत” (Law of Relationship) भी कहते हैं | यह सिद्धांत सभी
आकृतियों, तान व वर्ण का एक दूसरे के साथ साथ चित्रभूमि से सम्बन्ध निशित करता है
| वैसे तो इसका कोई निशित नियम नही है कि
अनुपात या प्रमाणन कैसे हो मगर फिर भी कुछ सीमाएं मानी गयी हैं जिनके उल्लघन से
चित्र में अरुचि उत्पन्न हो जाती है | वास्तव में प्रमाणन या अनुपात का कार्य चित्र
में रूचि उत्पन्न करना है |
संतुलन (Balance)
चित्रकला
सयोंजन के सिद्धांत में संतुलन एक महत्वपूर्ण सिद्धांत है जो चित्र में संतुलन
बनाये रखता है | इस सिद्धांत अनुसार चित्रण के सभी तत्व व वर्ण इस प्रकार
व्यवस्थित हों कि उनका भार या प्रभाव समस्त चित्र तल पर बराबर व संतुलित रूप से
वितरित हो |
संतुलन के रूप या
प्रकार :
आकृति का संतुलन
वर्ण का संतुलनतान का संतुलन,
परिप्रेक्ष्य संतुलन
विरोध (Contrast)
चित्र अगर एक जैसा है तो वो अच्छा नही लगेगा और ये उस चित्र
का एक अवगुण माना जायगा | इसी अवगुण को दूर करने के लिए चित्र में विरोध
(Contrast) का सहारा लिया जाता है | विरध के द्वारा संयोजन सघन हो जाता है तथा
आकृतियाँ और भी अधिक महत्वपूर्ण हो जाती हैं | विरोध में तत्वों का सयोजन बहुत ही
रुचिकर होता है जो चित्र को आकर्षक बना देता है | चित्र में विरोध को हम इन रूपों
में देख सकते हैं :-
रेखा का विरोध (Contrast of
Line)
दिशा का विरोध (Contrast of
direction)
वर्ण का विरोध (Contrast of
Color)
बल का विरोध (Contrast of Force)
आकार का विरोध (Contrast of
Form)
प्रभावित (Dominance/Emphasis)
यह सिद्धांत चित्र में सभी की नज़रों को अपनी और खिचता है | इसके अनुसार चित्र
में मुख्य आकृति या विषय को अधिक महत्व देकर बाकि चीजों को कम महत्व देते हुए
संयोजित किया जाता है | इसको हम चित्र में
निम्न प्रकार से प्राप्त कर सकते
हैं :-
- रंग, रेखा, अकार व स्थान के प्रयोग से,
- केंद्र में अपने मुख्य विषय या आकार को रखकर,
- अन्य आकारों को अलग व कम महत्व दे कर,
- मुख्य विषय के पीछे पर्याप्त स्थान छोड़ कर |
सामंजस्य (Harmonny)
जब चित्रण के सभी तत्व – रेखा, रूप, वर्ण, तान , पोत व
अन्तराल आदि एक दुसरे के साथ सुंदर सयोजन व मेल खाते हुए दिखाई दें, व चित्र में
कोई भी अलग थलग सा न लगे | तो ऐसी स्थिति ही सामंजस्य कहलाती है |
प्रवाह/लय
(Rhythm/Pattern/Movement)
कुछ
विद्वान इसे प्रवाह कहते हैं तो कुछ केवल लय कहते हैं | वास्तव में दोनों एक ही
चीज़ हैं | चित्र में गति या एक निश्चित
बारंबारता या दोहराव उस चित्र का प्रवाह या उसकी लय कहलाता है | भारतीय
चित्रण विद्या में लय को चित्र की आकृतियों का प्राण माना गया है | लय या प्रवाह
से चित्र में गति या क्रियात्मकता आती है जो उसे जीवित बनाते हैं |
सहयोग/एकता (Unity)
सहयोग या एकता चित्र संयोजन के सभी तत्वों में समानता व एक प्रकार का वो
सम्बन्ध है जो संयोजन को एकता के सूत्र में पिरोता है | जब चित्र के सम्पूर्ण
प्रभाव में एक भाव या अनुभूति उत्पन्न होती है तो चित्र में एकता/ सहयोग मानी जाती
है |
